शनि का गोचर

जानें सभी 12 राशियों में शनि के गोचर का ज्योतिषीय प्रभाव, साथ ही पढ़ें नौकरी, व्यापार, शिक्षा धन, प्रेम, विवाह और पारिवारिक जीवन पर क्या होता है इसका असर?

शनि गोचर समस्त नवग्रहों में शनि के गोचर की अवधि सबसे अधिक होती है। क्योंकि यह ग्रह लगभग ढाई वर्ष में राशि परिवर्तन करता है इसलिए शनि के गोचर का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन 30 महीनों की अवधि में शनि एक राशि में स्थित रहता है। इस दौरान वह वक्री गति भी करता है और पुनः मार्गी हो जाता है। शनि की वक्री अवस्था को सामान्यतः शुभ नहीं माना जाता है। क्योंकि इस समय में शनि अधिक संघर्ष करवाता है और इसके परिणामस्वरुप सफलता मिलने में देरी होती है।

वैदिक ज्योतिष में शनि का महत्व

भारतीय ज्योतिष शास्त्रों में शनि को क्रूर व पापी ग्रह कहा गया है, इसलिए शनि की साढ़े साती, ढैया और पनौती का नाम सुनकर ही लोग कांपने लगते हैं। हालांकि सही मायनों में शनि का स्वभाव ऐसा नहीं है। शनि देव न्यायप्रिय हैं इसलिए उन्हें कलियुग का न्यायाधीश कहा जाता है। वे हर मनुष्य को उसके कर्मों के आधार पर फल देते हैं। बुरे कर्म करने वालों को शनि देव दंडित करते हैं, वहीं अच्छे कर्म करने वाले लोगों को शुभ फल देते हैं।

वैदिक ज्योतिष में शनि को कर्म और सेवा का कारक कहा जाता है, अतः नौकरी और व्यवसाय पर इसका गहरा प्रभाव होता है। शनि के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को लगातार सफलता और समृद्धि मिलती है, लेकिन वहीं कुंडली में शनि की कमजोर स्थिति से नौकरी में बाधा, लगातार संघर्ष, सफलता मिलने में देरी, नौकरी छूट जाने और तबादले का भय आदि बातों का डर बना रहता है।

शनि के गोचर का फल

शनि देव को मकर और कुंभ राशि का स्वामित्व प्राप्त है। तुला राशि में यह उच्च भाव में होता है और मेष राशि में शनि नीच का माना जाता है। गोचर का शनि तृतीय, षष्टम और एकादश भाव में शुभ फल देता है। वहीं प्रथम, द्वितीय, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम और द्वादश भाव में यह अशुभ फल प्रदान करता है। आइये जानते हैं सभी 12 भावों में शनि के गोचर का फल-

प्रथम भाव में शनि का गोचर: शनि जब प्रथम भाव से गोचर करता है तो इसे अच्छा नहीं माना जाता है। क्योंकि इस समय में भाग्य मनुष्य का साथ नहीं देता है। रोजमर्रा के कार्यों में देरी और विवाद की संभावनाएँ बनती हैं। आर्थिक रूप से भी शनि का गोचर प्रथम भाव में अनुकूल नहीं होता है। कभी-कभी यहां स्थित शनि तनाव और अवसाद का कारण बनता है।

द्वितीय भाव में शनि का गोचर: द्वितीय भाव में भी गोचर का शनि शुभ फल नहीं देता है। इस समय में परिवार में दुःख और जीवनसाथी के साथ अलगाव की स्थिति पैदा होने की संभावना रहती है। नौकरी और आर्थिक स्थिति में भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। द्वितीय भाव में शनि का गोचर पारिवारिक जीवन के लिए भी अच्छा नहीं माना जाता है।

तृतीय भाव में शनि का गोचर: तृतीय भाव में शनि का गोचर शुभ माना गया है। इस समय में परिस्थितियां व्यक्ति के लिए अनुकूल होने लगती हैं। खोया हुआ आत्म विश्वास पुनः प्राप्त होता है। जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। तृतीय भाव में स्थित शनि मनुष्य की इच्छा और सपनों को पूरा करता है। पारिवारिक जीवन भी आनंदमयी रहता है।

चतुर्थ भाव में शनि का गोचर: चतुर्थ भाव में शनि के गोचर से पारिवारिक समस्याएँ, आर्थिक अस्थिरता, प्रॉपर्टी में हानि और सेहत संबंधी विकारों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए गोचर के शनि का चतुर्थ भाव में स्थित होना अशुभ माना गया है।

पंचम भाव में शनि का गोचर: पंचम भाव में शनि का गोचर होने से जीवनसाथी या बिजनेस पार्टनर के साथ विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है। कार्यों में हानि अधिक होने से मन उदास रहता है।

षष्टम भाव में शनि का गोचर: इस भाव में शनि का गोचर बहुत शुभ माना गया है। इस समय में शत्रुओं पर विजय और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में सफलता प्राप्त होती है। यहां स्थित शनि आर्थिक लाभ प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त परिजन और रिश्तेदारों से व्यक्ति के संबंध मधुर बने रहते हैं।

सप्तम भाव में शनि का गोचर: सप्तम भाव से शनि का गोचर सामान्यतः अच्छा नहीं माना जाता है। इस समय में जीवनसाथी या बिजनेस पार्टनर के साथ रिश्ते ज्यादा मधुर नहीं रहते हैं। कार्यों में देरी होने से चिंता बढ़ती है। इस अवधि में लोगों के साथ व्यवहार करते हुए संयम से काम लेना पड़ता है।

अष्टम भाव में शनि का गोचर: यहां स्थित शनि जीवनसाथी के साथ समस्याएँ उत्पन्न करता है। व्यक्ति किसी बीमारी से पीड़ित हो सकता है और इलाज के लिए ऑपरेशन की नौबत तक आ सकती है। इस समय में धन हानि होने की संभावना अधिक होती है इसलिए आर्थिक रूप से यह कठिनाइयों से भरा समय होता है। नौकरी में भी कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

नवम भाव में शनि का गोचर: नवम भाव से शनि का संचरण नौकरी में कई परिवर्तनों का कारण बनता है। इस समय में व्यक्ति कई जॉब चेंज कर सकता है। यहां स्थित शनि तनाव और चिंता का कारण बनता है। लंबी यात्राओं की संभावना बनती है।

दशम भाव में शनि का गोचर: इस भाव में शनि का गोचर होने से नौकरी और व्यवसाय में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऑफिस में वरिष्ठ अधिकारी के साथ संबंधों के लिहाज से यह समय चुनौतीपूर्ण होता है। अत्यधिक तनाव का सामना करना पड़ता है। वहीं जीवनसाथी के साथ मतभेद होने की संभावना रहती है। आय से अधिक खर्च होता है।

एकादश भाव में शनि का गोचर: एकादश भाव में गोचर का शनि शुभ फल प्रदान करता है। इस समय में व्यक्ति को आर्थिक लाभ होता है। जीवनसाथी, परिजन और मित्रों के साथ संबंध मधुर रहते हैं। नौकरी और व्यवसाय को लेकर मन में प्रसन्नता बनी रहती है। मांगलिक कार्यों में सम्मिलित होने की संभावना बनती है।

द्वादश भाव में शनि का गोचर: कुंडली के अंतिम यानि द्वादश भाव में शनि का गोचर होने से व्यक्ति तनाव, रोग और अवसाद से ग्रस्त हो सकता है। इस समय में व्यक्ति के द्वारा जमा किया हुआ धन अधिक से अधिक खर्च होने की संभावना रहती है। नौकरी छूट जाने और जीवनसाथी से अलगाव का भय बना रहता है। इस अवधि में व्यक्ति को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

कहते हैं कि शनि रंक को राजा और राजा को रंक बना देता है। शनि अगर मेहरबान है तो व्यक्ति जीवन में बहुत उन्नति करता है लेकिन शनि जब कष्ट देता है तो व्यक्ति को समस्या और संघर्ष का सामना करना पड़ता है। शनि के अशुभ फल से बचने के लिए शनि ग्रह की शांति के उपाय अवश्य करना चाहिए। इनमें शनिवार के उपाय, शनिवार का व्रत, छाया पात्र दान, शनि यंत्र और नीलम रत्न धारण करना आदि प्रमुख तरीके हैं। शनि संबंधित दान और मंत्रों के प्रभाव से शनि जनित कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में शांति व समृद्धि बनी रहती है।

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